Tuesday, April 28, 2009

गंगा का ग्लेशियर ख़तरे में

भारत में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि गंगा नदी को जल की आपूर्ति करने वाला ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन के कारण इस सदी के अंत तक पूरी तरह पिघल सकता है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर जलवायु परिवर्तन में तेज़ी आई तो ग्लेशियर और तेज़ी से पिघलेगा. उनका कहना है कि इस स्थिति के लिए कार्बन डाई आक्साइड का बढ़ता उत्सर्जन ही ज़िम्मेदार है.
वैज्ञानिक इसलिए भी अधिक चिंतित हैं क्योंकि इस ग्लेशियर से गंगा नदी को पानी मिलता है और लाखों लोग इस पर पानी के लिए आश्रित हैं.
उधर ब्रिटेन सरकार की अंतरराष्ट्रीय विकास विभाग के लिए किए गए एक शोध में कहा गया है कि इस खतरे को बहुत अधिक बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है.
शोध के अनुसार मैदानी इलाक़ों में नदियों को मानसून का पानी मिलता है इसलिए ग्लेशियर के पिघलने का ये मतलब नहीं लगाना चाहिए कि पूरी नदी सूख जाएगी.
लेकिन जलवायु परिवर्तन मामले में विभिन्न सरकारों के पैनल की अध्यक्षता कर रहे डॉ आर के पचौरी ने बीबीसी से कहा कि अगर जलवायु परिवर्तन होता रहा तो इसका प्रभाव मानसून पर भी पड़ेगा.
इसका अर्थ यह हुआ कि मानसून और ग्लेशियर दोनों ही जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रहे हैं.
नेपाल में बढ़ती गर्मी का असर वहां के पहाड़ों पर पड़ता दिख रहा है और वो कई बार पूरी दुनिया से कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन कम करने के अपील कर चुका है.
नेपाल में कई ग्लेशियर पिघल कर झील बन चुके हैं। इन झीलों से कई प्रकार के खतरे भी पैदा हो सकते हैं क्योंकि इन झीलों के तटबंध टूटने से आस पास के घरों को भी भारी नुकसान पहुंचता है.
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स्रोत : बीबीसी

ये क्या हो रहा भाई : प्रमुख नदियों का जलस्तर तेजी से घटा

दुनिया की कुछ प्रमुख नदियों का जल स्तर पिछले पचास वर्षों में गिर गया है.
अमरीका में हुए एक नए अध्ययन के अनुसार इसकी प्रमुख वजह जलवायु परिवर्तन है.
दुनिया भर में सिर्फ़ आर्कटिक क्षेत्र में ही जल स्तर बढ़ा है और उसकी वजह तेज़ी से पिघल रही बर्फ़ है.
भारत की गंगा नदी से लेकर उत्तरी चीन की ह्वांग हे नदी या पीली नदी और अमरीका की कोलोरेडो नदी तक, दुनिया की अधिकतर जनसंख्या को पानी पहुँचाने वाली ये नदियाँ सूख रही हैं.
अमेरिकन मीटियरॉलॉजिकल सोसाइटी की जलवायु से जुड़ी पत्रिका ने वर्ष 2004 तक, पिछले पचास वर्षों में दुनिया की 900 नदियों के जल स्तर का विश्लेषण किया.
इसमें पता ये चला कि दुनिया के समुद्रों में जो जल पहुँच रहा है उसकी मात्रा लगातार कम हो रही है.
इसकी बड़ी वजह आदमी की कारगुज़ारियाँ हैं, फिर वो चाहे बाँध बनाना हो या खेती के लिए नदियों का मुँह मोड़ना.
मगर शोधकर्ताओं ने ये कहते हुए जलवायु परिवर्तन की भूमिका पर ज़ोर दिया है कि बढ़ते तापमान की वजह से वर्षा का क्रम बदल रहा है और जल के भाप बनने की प्रक्रिया तेज़ हो रही है.
शोधकर्ताओं ने पानी के स्रोतों की ऐसी क़मी पर चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा है कि दुनिया भर में लोगों को इसकी वजह से काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा.
वैसे तो दक्षिण एशिया में ब्रह्मपुत्र और चीन में यांगज़े नदियों का जल स्तर अब भी काफ़ी ऊँचा है मगर चिंता ये है कि वहाँ भी ऊँचा जल स्तर हिमालय के पिघलते ग्लेशियरों की वजह से है.
यानी जैसे जैसे भविष्य में ग्लेशियर या हिम नद पिघलकर ग़ायब होंगे इन नदियों का जल स्तर भी नीचे हो जाएगा।
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स्रोत : बीबीसी